रसीदी टिकट में अपने प्यार की कहानी कुछ यूं लिखते हैं अमृता प्रीतम!
अमृता प्रीतम की जितनी तारीफ की जाए उतनी ही कम है। अपनी मोहब्बत को वो शब्दों का सहारा लेकर पन्नों पर उकेरती रही। अमृता प्रीतम ने जिसे चाहा उनका प्यार वो तो उन्हें नहीं मिल पाया। लेकिन पूरे देश का प्यार उन्हें ज़रूर मिला है। अमृता का जन्म 19 अगस्त 1919 में पंजाब के गुजराँवाला में हुआ। वर्तमान में ये शहर पाकिस्तान में है। अमृता प्रीतम को पंजाब की पहली कवयित्री माना जाता है। उन्होंने लगभग 100 किताबें लिखी हैं।
अमृता की शादी मात्र 6 साल की उम्र में ही हो गई थी। उनका बचपन लाहौर में बीता और उन्होंने अपनी शिक्षा भी वहीं से प्राप्त की। किशोरावस्था में ही अमृता ने लिखना शूरू कर दिया था। एकबार की बात है जब लाहौर के पास प्रीत नगर में एक बड़े मुशायरे का आयोजन हुआ। लाहौर से अमृता वहां पहुंची और साथ ही साहिर लुधियानवी भी उस मुशायरे में शामिल हुए। वहीं से शुरू होती है अमृता की प्रेम कहानी। एक ऐसी कहानी जहां प्यार तो है लेकिन मिलन नहीं। अमृता और साहिर की पहली मुलाकात लाहौर के उसी मुशायरे में हुई थी। पहली मुलाकात में ही अमृता साहिर को अपना दिल दे बैठी। साहिर का दिल भी अमृता पर आ गया था लेकिन वो इस बात को कबूल नहीं कर पा रहे थे। दोनों में से किसी ने भी एक दूसरे को कुछ नहीं कहा।
अब इस मुलाकात के बाद दोनों के प्रेम का सिलसिला शुरू होता है। अमृता अपने प्यार साहिर से मिलने जाया करती थी। लेकिन दोनों ही खामोश रहा करते थे। अमृता बताती हैं साहिर को जली सिगरेट छोड़कर नई सिगरेट जला देने की आदत थी और अमृता साहिर की छोड़ी अधूरी सिगरेट को संभाल कर रख लेती थी। ऐसे ही उन्हें सिगरेट की लत लगी थी।
अपनी किताब रसीदी टिकट में अपने प्यार का ज़िक्र करते हुए अमृता लिखती हैं कि जब साहिर मुझसे मिलने लाहौर आया करते तब हमारे दरम्यान रिशतों का विस्तार बन जाता। मेरा खामोशी का फैलाव हो जाता। मानो ऐसे जैसे मेरा बगल वाली कुर्सी पर आकर वो चुपचाप चले गए हो। वो अहिस्ता से सिगरेट जलाते, थोड़ा कश लेकर उस आधी छोड़ देते। जली सिगरेट को बीच में छोड़ देने की आदत सी थी साहिर में। अधजली सिगरेट को रखकर नयी जला लेते थे। जैसे हमेशा कुछ बेहतर तलाश रहे हों।
अमृता लिखती हैं कि साहिर की अधूरी सिगरेट को संभाल कर रखना सीख लिया था मैंने। अकेलेपन में यही मेरी साथी थी। उनकी उन सिगरट को उंगलियों में थामना मानो साहिर का हाथ थामना था। उनकी छुअन को महसूस करना था.. सिगरेट की लत मुझे ऐसे ही लगी। साहिर ने मुझसे बहुत बाद में अपने इश्क़ का जिक्र किया। उन्होंने बाताया कि वो मेरे घर के पास घंटों खड़े रहकर खिड़की खुलने का इंतज़ार करते थे। घर के नुक्कड़ पर आकर पान खरीदते, सिगरेट सुलगाते या फिर हाथ में सोडे का गिलास ले लेते।
फिर 1947 में बंटवारे के बाद साहिर बम्बई के होकर रह गए और अमृता अपने परिवार के साथ दिल्ली आ गई। लेकिन दोनों एक दूसरे को खत भेजा करते थे। इसी बीच अमृता के पति प्रीतम सिंह को साहिर के साथ उनकी महोब्बत के बारे में पता चल जाता है। और फिर इसके बाद अमृता के पति घर छोड़कर दिल्ली में एक किराए के मकान में रहने लग जाते हैं। बाद में धीरे-धीरे साहिर और अमृता दोनो के बीच खतों का आना जाना बंद हो जाता है और उनका का रिश्ता फीका पड़ने लगता है।
इसी बीच उनकी जिंदगी में एक नया शख्स आता है जिसका नाम है इमरोज। इमरोज को अमृता से प्यार हो जाता है। इमरोज जानते है कि अमृता शादी हो चुकी है और वो किसी और से प्यार करती हैं। लेकिन ये सब जानते हुए भी वो अमृता को अपनी दिल दे बैठते हैं। और तो और इसके बाद भी इमरोज को अमृता के साथ रहना और जीना स्वीकरा था। इमरोज़ के साथ स्कूटर पर पीछे बैठी हुई अमृता अपनी उंगलियों से उनकी कमर पर साहिर का नाम लिखती थी। यह सब जानते हुए भी, इमरोज ताउम्र अमृता से महोब्बत करते रहे। अमृता और इमरोज एक छत के नीचे अलग-अलग कमरे में रहा करते थे। अमृता रात के समय लिखा करती थी और इमरोज रोज रात के एक बजे उठ कर अमृता के लिए चाय बनाया करते और चुपचाप अमृता के आगे रख दिया करते थे। अमृता के बीमारी से जुझते आखिरी समय में भी इमरोज ने अमृता का साथ निभाया था। इमरोज़ का प्यार इबादत की तरह था। जो पास होते हुए भी साथ होते हुए भी उन्हें नहीं मिल पाया। इमजोर अमृता को बेपनाह प्यार करते रहे लेकिन इसके बावजूद भी वो साहिर को नहीं भूल पाई।
मृता प्रीतम उन साहित्यकारों में थी जिनकी कृतियों का अनेक भाषाओं में अनुवाद किया गया है। अमृता प्रीतम को भारत का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान पद्मविभूषण भी प्राप्त हुआ। 1957 में अमृता को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, 1958 में में पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत दिया गया। 1988 में में बल्गारिया वैरोव पुरस्कार और 1982 में उन्हें में भारत के सर्वोच्च साहित्त्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अमृता को उनकी कविता ‘अज्ज आखाँ वारिस शाह नूं’ के लिए बहुत प्रसिद्धी प्राप्त हुई थी। इस कविता में भारत विभाजन के समय पंजाब में हुए भयानक घटनाओं का अत्यंत दुखद वर्णन किया गया है।

Nice
जवाब देंहटाएंVery informative
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