जानिए अपने शब्दों से दिल जीतने वाले शिव कुमार बटालवी के बारे में

अपने प्यार को अपने शब्दों में पिरोने वाले शिवकुमार बटालवी पंजाब के मशहुर कवि थे। जो आज भी अपनी कविताओं, शायरी और गीतों से जाने जाते हैं। शिव की हर एक कविता में उनका दर्द ज़ाहिर होता है। शिव की कविताओं, शायरी और गीतों में उनकी भावनाओं का उभार, करूणा, जुदाई और प्रेमी से बिछड़ने का दर्द बखुबी ज़हिर होता है। उनके शब्द दिल को चीर देने वाले होते थे। वे पंजाब के ऐसे गायक थे जिनके गीत हिंदी में ना आकर भी वो बहुत लोकप्रिय हुए हैं। उस दौर की प्रसिद्ध कवयित्री अमृता प्रीतम ने उन्हें 'बिरह का सुल्तान' नाम दे दिया था। शिव कुमार बटालवी ने अपनी शायरी गुरमुखी में लिखी है।

लड़कपन में गांव के मेले में शिव का दिल एक लड़की पर आया था। लेकिन कुछ समय बाद किसी बीमारी के कारण उस लड़की की मौत हो गई। तत्पश्चात शिव उस लड़की से बिछड़ने के गम को अपने शब्दों में इस कदर लिखते थे कि वो गीत आज भी बहुत ही ज्यादा लोकप्रिय है। कुछ समय पहले आई फिल्म उड़ता पंजाब में इस गीत को लिया गया और वो गीत लोगों को बहुत पसंद आया है। शिव लिखते हैं कि

इक कुड़ी जिहदा नाम महोब्बत गुम है

ओ साद मुरादी, सोहनी फब्बत

गुम है, गुम है, गुम है

ओ सूरत ओसदी, परिया वर्गी

सीरत दी और मरियम लगदी

हस्दी है तां फूल झड़दे ने तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी

शिव का जन्म 23 जुलाई 1936 में पंजाब के सियालकोट में हुआ था। जो अब पाकिस्तान में हैं। शिव के पिता एक तहसीलदार थे। देश के बंटवारे के समय शिव हिंदुस्तान आ गए। यहां वो गुरदासपुर में बसे। वे 1967 में साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले सबसे कम उम्र के सहित्यकार बन गए। शिव को एकबार फिर से प्यार हुआ। शिव को पंजाब के मशहुर लेखक गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी की बेटी से प्यार हो गया। लेकिन प्यार हर किसी को कहां मिल पाता है। प्यार के बीच पैसा या जात ज़रूर आ जाती है। यही शिव के साथ हुआ। दोनों के बीच जाति भेद होने के कारण शिव का प्यार उनसे बिछड़ गया। उनकी प्रेमिका ने एक ब्रिटिश नागरिक से शादी कर ली। प्यार से बिछड़ने का दर्द उनके गीतों में साफ ज़ाहिर होता है। 

अपने प्यार के बिछड़ जाने के दर्द को शिव अपने शब्दों में इस बयां करते हुए लिखते हैं

माए नी माए मैं इक शिकरा यार बनाया

चूरी कुट्टाँ ताँ ओह खाओंदा नाहीं

वे असाँ दिल दा मास खवाया

इक उड़ारी ऐसी मारी

इक उड़ारी ऐसी मारी

ओह मुड़ वतनीं ना आया, ओ माये नी!

मैं इक शिकरा यार बनाया

शिकरा एक पक्षी है जो दूर से अपने शिकार को देखता है और सीधे उसका मांस नोंच कर फिर ले उड़ जाता है। इन पंक्तियों में शिव ने अपनी प्रेमिका को शिकरा कहा है। क्योंकि शिव के दिल में जिस लड़की ने जगह बनाई थी, वह शादी करके उसके पति के साथ विदेश चली गई और शिव को अकेला छोड़ गई। अब शिव के पास बस उसकी यादें रह गई थी और शिव ताउम्र प्यार से बिछड़ने के गम में लिखते रहे।

शिव अपनी कविताएं, शायरी और गीत गुरमुखी में लिखते थें। लेकिन समय के साथ-साथ शिव हिंदी भाषी लोगों के बीच में काफी लोकप्रिय हुए। उनके गीत "इक कुड़ी जिहदा नाम महोब्बत गुम है" से लेकर "आज दिन चड़ेया" तक काफी लोकप्रिय हुए। शिव हर लम्हे को, अपने साथ बीती हर बात को अपने शब्दों में शायरी, कविता और गीतों के ज़रिए इस कदर बयान कर देते थे की आज भी उनके शब्द लोगों के दिल को छू जाते है। 

कहा जाता है कि अपने प्यार की वियोग की पीड़ा जब कभी बढ़ जाती थी, तब शिव शराब में चूर होकर चंडीगढ़ में चौराहे पर लैम्प-पोस्ट के नीचे रात-रात भर खड़े रहकर कविताएं गाया करते थे। शिव की कई रचनाएं ऐसी है जिसमें निराशा और मृत्यु की इच्छा दिखाई पड़ती है।

एह मेरा गीत किसे ना गाणा

एह मेरा गीत मैं आपे गा के

भलके ही मर जाणा।

शिव के कहने का अर्थ है कि ये मेरे गीत किसी को नहीं गाने, ये मेरे गीत मुझे खुद ही गा के, अगले दिन मर जाना है।

असां ते जोबन रुत्ते मरना,

डोबन रुत्ते जो भी मरदा फूल बने या तारा

जोबन रुत्ते आशिक़ मरदे या कोई करना वाला

शिव कहते हैं कि मोहब्बत करने वाले लोग सच्चे होते हैं कि मुझे जवानी में मरना है, क्यूंकि जवानी में जो मरता है वो या तो फूल बनाता है या तारा, जवानी में तो कोई किस्मत वाला ही मरता है।

शिव की रचनाओं में निराशा और दर्द साफ दिखाई पड़ते हैं शिव लिखते हैं कि

की पूछ दे ओ हाल फ़कीरां दा

साडा नदियों बिछड़े नीरा दा

साडा हंज दी जून आयां दा

साडा दिल जलया दिलगीरा दा

इसका अर्थ है कि हम जैसे फ़कीरों का हाल पूछते हैं, हम नदियों से बिछड़े पानी जैसे हैं, जैसे किसी आंसू से निकले हैं- अकेले और उदास।

सिर्फ 24 साल की उम्र में शिव की कविताओं का पहला संकलन "पीड़ा दा परागा" प्रकाशित हुई। 1965 में अपनी कृति काव्य नाटिका "लूणा" के लिए शिव को साहित्या अकादमी पुरस्कार मिला। उस समय शिव की उम्र मात्र 28 साल थी। इसलिए शिव साहित्या अकादमी पुरस्कार पाने वाले सबसे कम उम्र के साहित्यकार बने। "लूणा" जो कि एक ऐतिहासिक कविता का रूप है। जिसमे एक पुरुष होते हुए शिव ने औरत के दर्द को समझा, महसूस किया और अपने कलम के ज़रिए लिखा। उन्होंने रानी लूना की छवि खराब करने के लिए समाज को जिम्मेदार ठहराया। जो आधुनिक पंजाबी सहित्य की अद्धभुत रचना भी मानी जाती है। शिव की प्रसिद्ध काव्य रचनाओं के नाम हैं, पीड़ा दा पागा, लाजवंती, आटे दीया चिड़ियास मैनू विटा करों, दरदमन्दा दीआ आही, लूणा, मैं ते मैं, आरती और बिरह दा सुल्तान( अमृता प्रीतम द्वारा संकलित)।

शिव शादी के बाद चंडीगढ़ चले गए थे। वहां से उन्होनें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में काम किया। अंतिम के कुछ वर्षों मे शिव का स्वास्थ्य काफी खराब रहा। लेकिन उस समय भी उन्होंने अपना लेखन जारी रखा। शिव अपनी लेखन में मृत्यु की चाह को इस कदर ज़हिर करते थे की इश्वर नें भी उनकी सुन ही ली और मात्र 36 साल की उम्र में शीव की मृत्यु हो गई। 7 मई 1973 में शराब की लत के कारण हुए लीवर सिरोसिस की वज़ह से, पठानकोट के किरी मांग्याल में अपने ससुराल में शिव की मृत्यु हो गई। 36 साल तक की उम्र के सफर में शिव कुमार बटालवी ने दर्द, प्रेम और विरह पर कई कविता, ग़ज़ल, नज़्म, किस्सा, गद्य और नाटक लिखे। जो आज भी बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय है।

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