गुरू नानक देव जी के जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें...

सिखों के प्रथम गुरू श्री गुरू नानाक देव जी की 550वीं जयंती 12 नवंबर को बड़े ही हर्षोंल्लास से बनाई जा रही है। गुरू नानक देव जी का जन्म 1469 में कार्तिक मास की पूर्णिमा को पंजाब(पाकिस्तान) रावी नदीं के किनारे बसे क्षेत्र तलवंडी मे पिता मेहता कालू और माता तृप्ता के घर हुआ था। 16 वर्ष की उम्र में उनका विवाह कन्या सुलक्खनी से हुआ। इनके दो पुत्र श्रीचंद और लख्मी चंद थे। गुरू नानक देव जी अपने चार साथी के साथ तीर्थ यात्रा पर गए। उन्होनें चारों और घूमकर उपदेश दिए। 1521 तक उन्होंने तीन यात्राचक्र पूरे किए, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य स्थानों का भ्रमण किया। धर्म प्रचार और समाज से बुराइयों को दूर करने के लिए नानक विदेशों की यात्रा करते थे।

सांप का छाया देना
गुरू जी रोज़ ही पशुओं को जंगर जूह में ले जाते थे। एक दिन वैसाख के महीने पर गुरू जी पशुओं को जंगल में लेजाकर एक पेड़ के नीचे छांय में लेट गए जैसे ही सूरज ढलने लगा पेड़ की छांया भी कम होने लगी। तभी एक सफेद सांप अपने फन के साथ गुरू जी को छाया करके बैठ गया।
उस समय राय बुलार अपने साथियों के साथ शिकार कर घर जा रहा था। राय बुलार ऐसे दरिष्य को देख दंग रह गया और मन-ही-मन में गुरू जी की महिमा गाते हुए अपने घर चला गया।

जब काबा पहुंचे गुरू नानक देव जी
गुरू नानाक देव जी एक दिन मक्का पहुंचे। दिनभर घूमने के कारण गुरू जी थक गए थे। गुरू जी रात के समय थक कर काबा की तरफ विराज गए। काबा मुस्लमानों का प्रसिध्द पूज्य स्थल है। इसी समय इस्लाम को मानने वाले कुछ लोग वहां पहुंचे। उन्होंने नानक जी को जगाया और क्रोध में बोले कि तू कौन काफिर है, जो अल्लाह के घर की तरफ पैर करके सो रहा है?  नानक जी ने शांति से जवाब दिया, मैं दिनभर का थका हुआ हूं। इसलिए सो गया और मुझे तो हर तरफ ईश्वर नज़र आता है। तुम्हीं बताओ किस ओप पैर करके सोऊं।
इस पर उन लोगों को गुस्सा आ गया उन्होंने गुरू जी के पैर पकड़कर काबा के उल्टी दिशा में घुमा दिए। जैसे ही उन्होंने गुरू जी के पैर घुमाएं उन्होंने देखा जहां गुरू जी के पैर थे मक्का उसी तरफ था। उन्हें लगा भ्रम हुआ। उन लोगों ने गुरू जी के पैर दूसरी तरफ घुमा दिए। लेकिन फिर काबा इसी ओर दिखने लगी। अब उन्हें समझ आ गया की नानक जी साधारण इंसान नही हैं। लिहाजा उन्होंने गुरू जी से माफी मांगी।

कड़वे रीठे कैसे हो गए मीठे
जब गुरू जी पूर्व की ओर बनारस जा रहे थे तो मरदाना ने कहां महाराज! आप मुझे जंगल पहाड़ों मे घुमाए जा रहे हो, मुझे बहुत भुख लगी है। अगर कुछ खाने लायक मिल जाए तो उसे खाकर आगे की यात्रा करने लायक हो जाऊंगा। उस समय गुरू जी रीठे के पेड़ के नीचे बेठे आराम कर रहे थे। आप ने वृक्ष के ऊपर देखा और मरदाने से कहा की अगर तुम्हे भूख लगी है तो रीठे कि टहनी को हिलाकर रीठे गेरकर खा लो। मरदाने ने गुरू के हुक्म का पालन करते हुए टहनी के हिलाया व रीठो को नीचे गिरा दिया। जब मरदाने ने रीठे खांए तो लो छुहारे कि तरह मीठे थे। उन्होंने पेट भरकर रीठे खाए। इस वृभ के रीठे आज भई मीठे हैं। जो नानक मते जाने वालों को प्रसाद के रूप में दिए जाते हैं। यह मीठे रीठे का पेड़ नानक मते से 45 मील दूर है।

कौड़े राक्षस को तारना
श्री गुरू नानक देव जी विध्यांचल के दक्षिणी जंगलों में गए। वहां एक कौड़ा नाम का राक्षस रहता था जो इन्सानों को तलकर खाता था। कौड़ा राक्षस मरदाने को तल कर खाने लगा था। तभी गुरू जी ने वहां समय पर पहुंच कर मरदाने की रक्षा की।
गुरू जी ने उससे कहा कि तुम्हें जीवों के ऊपर रहम व दया का भाव रखना चाहिए। मेहनत की कमाई करना व नाम स्मरण की भी उपदेश दिया। इस प्रकार गुरू जा ने उसे दैंत से देवता का जीवन बख्श दिया।

वला कंधारी का अहंकार तोड़ना
गुरू जी मक्के से वापिस आते हुए नौशहरा से होते हुए अब्दाल से बहार पहाड़ी के नीचे आकर बैठ गए। इस पहाड़ी के शिखर पर पीर वली कंधारी का निवास था। जिसकी दूर-दूर तक बहुत मान्यता थी। उस अपनी करामातों पर अहंकार था। गुरू जी नें मरदाना को उस पहाड़ी पर चश्मे का पानी लेने के लिए भेजा पर वली कंधारी ने पानी देने से इंकार कर दिया। मरदाना नें कंधारी के आगे बहुत मिन्नतें की पर वली ने उनसे का की अगर तेरा पीर शक्तिशाली है तो वह नया चश्मा निकालकर तुम्हें पानी दे।

मरदाने ने यह बात आकर गुरू जो को कहीं तो गुरू जी ने मरदाने के कहा कि सतनाम कहकर एक पत्थर उठाकर दूसरी तरफ रख दों, करतार के हुक्म से पानी का चश्मा चल पड़ेगा। जब पत्थर के नीचे से पानी का चश्मा निकला तो इसके चलने से ही पहाड़ी पर वाली कंधारी का चश्मा का पानी कम होनें लगा। वली कंधारी को यह देखकर क्रोध आ गया जब पत्थर के नीचे से पानी का चश्मा निकला तो इसके चलने से ही पहाड़ी पर वली कंधारी का चश्मा बंद हो गया नीचे पहाड़ी का चश्मा चल रहा है।

तो उसने क्रोध में आकर अपनी पूरी शक्ति के साथ पहाड़ी की एक चटान को गुरू जी की तरफ फेंक दिया पर गुरू जी ने उसे अपने हाथ के पंजे से रोक दिया। गुरू जी की इन दोनों शक्तियों को देख वली का अहंकार टूट गया और गुरू जी से अपने अपमान भरे शब्दों के लिए माफी मांगी। आज उस स्थान पर श्री पंजा साहिब गुरुद्वारा पंजा साहिब मौजूद है।

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