25 जून 1975 को रातों-रात आपातकाल की घोषणा क्यों की गई?

आज से 44 साल पहले 25 जून 1975 को देश में आपातकाल की घोषणा करी थी, जो 21 मार्च 1977 तक लगी रही। इसे देश का काला अध्याय भी कहा जाता है। तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रूद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा की थी। आपातकाल लागू होते ही चुनाव स्थगित हो गए थे। रातोंरात लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिए गए थे। अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

इंदिरा गांधी के विरोध करने वाले नेता जयप्रकाश नारायण, मोराजी देसाई और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे बड़े नेताओं को सलाखों के पिछे पहुचा दिया गया था। साथ ही सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों, समाजसेवियों, नागरिक संगठनों के लोग और छात्रों को भी सलाखों के पीछे भेज दिया गया था। अखबारों को सरकार के खिलाफ कुछ भी छापने की अनुमति नही थी यदि कोई अखबार ऐसे करता था तो उसकी सेंसरशिप रद की जाने लगी। मीडिया से सारी आजादी छीन ली गई थी। जेपी की रामलीला मैदान में हुई रैली की खबर लोगों तक ना पहुंचे इसलिए दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अकबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई थी। आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने जोर-शोर से नसबंदी अभियान चलाया जिसमें 19 महीने के दौरान देश भर में करीब 83 लाख लोगों की जबरदस्ती नसबंदी करा दी गई थी।

कहा जाता है कि आपातकाल की नींव 12 जून 1975 को ही रख दी गई थी। जब इलाहबाद हाईकोर्ट ने पीएम इंदिरा गांधी को रायबरेली के चुनाव अभियान में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग करने का दोषी पाया था और छह साल तक चुनाव लड़ने पर और किसी भी तरह के पद संभालने पर रोक भी लगा दी गई थी। एक दिन बाद जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा को इस्तीफा देने तक देश में रोज प्रदर्शन शुरू कर दिया साथ ही और कई नेता हड़ताल में साथ आए। इंदिरा गांधी अपनी सीट छोड़ना नही चाहती थी इसलिए कानूनी मामलों के बड़े जानकार सिध्दार्थ शंकर रे को 25 जून को सुबह इंदिरा गांधी से मिलने के लिए बुलाया गया। रे से जब इंदिरा गांधी ने पूछा कि हमें क्या करना चाहिए तो उन्होनें 'सशस्त्र संघर्ष' का मतलब राज्य में आंतरिक कलह के रूप में निकाला। इस तरह रे और इंदिरा का मानना था कि जयप्रकाश नारायण ने जो आर्मी और पुलिस को सरकार के आदेश नहीं मानने की बात कही है वो 'सशस्त्र संघर्ष' के दायरे में आता है। इसके बाद इंदिरा ने कहा कि कैबिनेट से बात करना समय नहीं है।

इंदिरा इसमें कोई रूकावट नहीं चाहती थी। तभी रे ने बताया कि राष्ट्रपति की सहमति के लिए जो भी फाइलें भेजी जाती हैं उसमें हर किसी में ये जरूरी नही होता कि कैबिनेट की सहमति हो या कैबिनेट को इसकी जानकारी दी जाए। इस मामले को लेकर इंदिरा गांदी ने राष्टपति को पत्र भेजा जिसमें लिखा कि देश में सुरक्षा माहौल बनाए रखने के लिए अपातकाल लगाना बेहद जरूरी है। उन्होनें लिखा कि वे इस मामले को लेकर कैबिनेट से जरूर डिस्कस करती लेकिन इतनी रात को ये संभव नहीं हैं। तभी इंदिरा गांधी ने तत्कालीन राष्ट्रीय फखरूद्दीन अली अहमद से आपातकाल के फैसले पर दस्तखत करवा लिए और रातों-रात भारत में आपातकाल की घोषणा कर दी।

वहीं अगली सुबह 26 जून को पूरे देश को रेडियो के माध्यम से इंदिरा गांधी ने आपातकाल का बारे में बताया। हालांकि, बाद में इंदिरा ने ये तर्क दिया था कि कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए वो कैबिनेट की राय नही ली। उन्होनें कहा कि वे ये निर्णय बेहद गोपनीय रखना चहती थी और इस लेकर विपक्ष के चौंकाना चाहती थी।

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