गोरखपुर में क्या फिर से खिलेगा कमल ?
उत्तर प्रदेश की गोरखपुर लोकसभा सीट हाई प्रोफाइल सीटों में से एक है. उत्तर-प्रदेश के पुरवानचल में बसा यह क्षेत्र गोरखनाथ मंदिर की वजह से दुनिया भर में मशहूर हैं. यहां समाजवादी पार्टी के प्रविन निशाद सांसद हैं. उन्होनें 2018में हुए यहां के उप-चुनाव में जीत हासिल करी हैं.
ये वो क्षेत्र है जिसमें संत कबीर, मुंशी प्रेमचंद, फिराक गोरखपुरी जैसे विश्व प्रसिद्ध लोग हुए. जिनके जरिए भारत को एक अलग पहचान मिली. गोरखपुर इस लोकसभा सीट में उत्तर-प्रदेश विधान सभा की 5सीटे आती हैं. जिनके नाम है गोरखपुर ग्रामीण, गोरखपुर नगरीय , सहजनवा, कैम्पियरगंज और पिपराईच.गोरखपुर संसदीय सीट पर लगभग 19.5 लाख मतदाता हैं. इस सीट पर सबसे ज्यादा निषाद समुदाय के वोटर हैं. गोरखपुर सीट पर करीब 3.5 लाख वोट निषाद जाति के लोगों का है. उसके बाद यादव और दलित मतदाताओं की संख्या है. दो लाख के करीब ब्राह्मण मतदाता हैं. इसके अलावा करीब 13फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं.
गोरखपुर के राजनीतिक इतिहास की बात करे तो गोरखपुर में पहली बार चुनाव 1952में हुआ जिसमें कांग्रेस के सिंहासन ने जीत हासिल की. वो 1992 तक लगातार यहां से सांसद रहे. 1967 में निर्दलीय उम्मीदवार गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजयनाथ ने जीत हासिल की. इसके बाद उनकी सियासी विरासत महंत अवैधनाथ ने संभाली और 1970में वो निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की. 1971 में कांग्रेस के नरसिंह नारायण पांडेय ने यहां से जीत हासिल की. लेकिन 1977में हरिकेश बहादूर भारतीय लोकदल जीतने में कामयाब रहे थे. इसके बाद वो कांग्रेस में शामिल हो गए और और 1980में फिर जीत हासिल की. 1984में कांग्रेस के मदन पांडेय यहां जीते. हालांकि एसके बाद अबतक यहां कांग्रस वापिस नही आई हैं.
1989में हिंदू महासभा के उम्मीदवार महंत अवैद्यनाथ ने यहां से जीत दर्ज की. इसके बाद 1991 में उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया और 1991 और 1996 में जीत का परचम लहराया. 1998 के बाद योदी अदित्यनाथ यहां से जीते आ रहे हैं. लेकिन सीएम बनने के बाद 2017में उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दे दिया और 2018 में बसपा के समर्थन से सपा से प्रवीण कुमार निषाद यहां सांसद बने.

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