जलियांवाला बाग हत्याकांड : जनरल डायर ने क्यूं ली बेकसूर लोगों की जान !
जलियांवाला बाग हत्याकांड को इस हफ्ते सौ साल पूरे होने जा रहे हैं। जिसमें अमृतसर के जलियांवाला बाग में जमा हुए निहत्थे लोगों को घेरकर चारों तरफ से गोलियां चलाई गई थी, इसमें बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई थी।
साल 1919 में ब्रिटेश सरकार ने हमारे देश में कई तरह के कानून लागू किए थे जैसे ‘रॉलेक्ट’ इस अधिनियम के अनुसार भारत की ब्रिटिश सरकार किसी भी व्यक्ति को देशद्रोह के शक के आधार पर गिरफ्तार कर सकती थी और उस व्यक्ति को बिना किसी जूरी के सामने पेश के जेल में डाल सकती थी। इसके अलावा पुलिस दो साल तक बिना किसी भी, जांच के किसी भी व्यक्ति को हिरासत में भी रख सकती था।
रॉलेक्ट के तहत पंजाब के दो क्रांतिकारी नेता डॉ. सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर लिया गया। यह दोनों नेता पंजाब में काफी लोकप्रिय थे। जिसके विरोध में अमृतसर के लोगो ने कई प्रदर्शन किए और कई रैलियां निकाली। अमृतसर के बिगड़ते हालातों पर काबू पाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने यह जिम्मेदारी डिप्टी कमेटीक मिल्स इरविंग से लेकर ब्रिगेडियर जनरल आर.इ.एट डायर को सौंप दी थी और डायर ने 11 अप्रैल को अमृतसर के हालातों को सही करने का काम शुरू कि दिया था।इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने माहौल पर काबू पाने के लिए अमृतसर शहर में कर्फ्यू लगा दिया जिसमें तीन से ज्यादा लोग एक जगहा साथ में एकत्र नही हो सकते थे। कई लोगों को इसके बारे में नही पता था।
13 अप्रैल 1919 बैसाखी के दिन कई लोग श्री हरिमंदिर साहिब दर्शन करने आए और उसी के करीब जलियांवाले बाग में कई लोग अपने परिवार के साथ बैसाखी का मेला देखने पहुंचे साथ ही जलियांवाले बाग में कुछ लोग नें अपने नेताओं की गिरफ्तारी को लेकर एक शांतिपूर्ण सभा रखी हुई थी। जनरल डायर को लगा की ये सभा दंगे फैलाने के मकसद से की जा रही थी। इसलिए जब जनरल डायर को इस जलियांवाले बाग में होने वाली इस सभा के बारे में पता चला तो जनरल डायर वहां 90 सैनिक लेकर पहुंच गया और बाग को चारो तरफ से घेर लिया फिर बिना कोई चेतावनी दिए वहां मौजूद निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी थी। बाग से बाहर निकलने वाले रास्ते को भी ब्रिटिश सैनिकों ने घेर लिया और लोग अपनी जान बचाने में नाकाम रहें।
कई लोग अपनी जान बचानें के लिए वहां मजूद कुएं में कूद गए लेकिन तब भी जान नही बचा पाए। जब फॉयरिंग बंद हुई तो कुएं से करीब 120 लाशे निकाली गई। अब उस कुएं को ‘शहीदी’ कुआं कहा जाता है। आज भी यह कुआं ब्रिटिश के बुरे मंसूबों में शिकार हुएं उन मासूम लोगों की याद दिलाता है जिन लोगों ने इस नरसंहार में अपनी जान गवा दी थी। ब्रिटिश सरकरा के अनुसार इस फायरिंग में लगभग 379 लोगों की जान गई थी और 1,200 लोग जख्मी हुए थे, लेकिम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुताबिक उस दिन 1,000 से ज्यादा लोग शहीद हुए थे, जिनमें से 120 की लाशें कुएं में से मिली थीं और 1,500 से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे। इस हत्याकांड की पूरी दुनियाभर में आलोचना हुई।
इसी के बाद देश को ऊधम सिंह जैसे क्रांतिकारी नेता मिले और देश के युवाओं के मन में देशभक्ति की लहर दौड़ पड़ी। जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लेने के लिए 13 मार्च 1940 को ऊधम सिंह ने लंदन जाकर कैक्सटन हॉल में डायर को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। 31 जुलाई 1940 को ऊधम सिंह को फांसी पर चड़ा दिया गया।



Shaheedo ko Naman🙏🏻
जवाब देंहटाएं